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खरीफ की फसलों पर खरपतवार का खतरा, 60 दिन की सतर्कता से बचाई जा सकती है उपज में गिरावट

नई दिल्ली: खरीफ की फसलें जैसे धान, मक्का, सोयाबीन, अरहर, मूंग और उड़द देश की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ मानी जाती हैं, लेकिन इन फसलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरते हैं खरपतवार। बारिश के मौसम में जहां खरीफ फसलें तेजी से बढ़ती हैं, वहीं खरपतवार भी तेजी से फैलते हैं और फसलों के लिए जरूरी पोषक तत्वों, पानी और सूर्यप्रकाश को छीन लेते हैं। इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है, जो कि 30 से 70 प्रतिशत तक घट सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि खरीफ सीजन में खरपतवारों पर नियंत्रण के लिए शुरुआती 60 दिन बेहद अहम होते हैं। अगर इस अवधि में समय पर नियंत्रण किया जाए, तो फसलों की पैदावार न केवल बचाई जा सकती है, बल्कि बढ़ाई भी जा सकती है। खासतौर पर मूंग और उड़द जैसी दलहनी फसलों में यह अवधि 30 से 35 दिन की होती है, जिसे क्रांतिक अवस्था कहा जाता है।

कैसे करें नियंत्रण?

खरपतवार नियंत्रण के दो प्रमुख तरीके हैं – यांत्रिक और रासायनिक। यांत्रिक विधि में निराई-गुड़ाई और वीडर (Weeder) का उपयोग शामिल है। 20-25 दिन के अंतराल पर निराई-गुड़ाई करने से खेतों में हवा का संचार बढ़ता है और मिट्टी की जलधारण क्षमता सुधरती है। वहीं रासायनिक विधियों में फसल के अनुसार अलग-अलग खरपतवारनाशक दवाओं का चयन जरूरी है:

धान के लिए

धान की सीधी बुवाई या रोपाई के साथ ही ब्यूटॉक्लोर (2.5 लीटर/हेक्टेयर) या प्रोटीलाक्लोर (1.5 लीटर/हेक्टेयर) का प्रयोग करना लाभकारी होता है। 20-25 दिन बाद खड़ी फसल में हेलोसल्फ्यूरॉन (100 ग्राम/हेक्टेयर) या बिसपायरीबैक सोडियम (20 ग्राम/हेक्टेयर) का छिड़काव किया जा सकता है। इसके अलावा 2,4-D (500 ग्राम/हेक्टेयर) भी एक प्रभावी विकल्प है।

मक्का और बाजरा के लिए

इन फसलों के लिए बुवाई के समय पेंडिमेथालिन (1 किग्रा/हेक्टेयर) का छिड़काव करें। बाद के चरण में खरपतवार की अधिकता हो तो टेम्बोट्रिओन (90-100 ग्राम/हेक्टेयर) का उपयोग किया जा सकता है। बाजरा में 20-25 दिन बाद एट्राज़ीन (500 ग्राम/हेक्टेयर) की मात्रा उपयोगी मानी गई है।

सोयाबीन और मूंगफली के लिए

शुरुआत में पेंडिमेथालिन कारगर साबित होता है। खड़ी फसल में खरपतवार अधिक हों तो मेट्रिब्यूज़िन (400 ग्राम/हेक्टेयर) को 700-800 लीटर पानी में मिलाकर छिड़कें।

मूंग, उड़द और अरहर के लिए

बुवाई के 1-2 दिन बाद पेंडिमेथालिन (1 किग्रा/हेक्टेयर) और 20-25 दिन बाद इमाज़ेथापायर (80 ग्राम/हेक्टेयर) का छिड़काव करें। इससे फसल को खरपतवारों के क्रांतिक चरण से बचाया जा सकता है।

क्यों है समय पर नियंत्रण जरूरी?

एक खरपतवार का पौधा हजारों बीज छोड़ सकता है, जिससे यह समस्या न सिर्फ एक सीजन में बल्कि अगले सीजन तक बनी रहती है। इसलिए नियंत्रण के लिए लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि खरपतवार चुपके से फसल का भोजन चुराते हैं, और इस चोरी को रोकने का उपाय यही है कि खेतों में उन्हें पनपने ही न दिया जाए। समय पर और फसल के अनुसार खरपतवार नियंत्रण से किसान न केवल उत्पादन बढ़ा सकते हैं, बल्कि लागत में भी कटौती कर सकते हैं। खरीफ सीजन में यदि 60 दिनों तक सतर्कता बरती जाए, तो पूरा सीजन लाभदायक साबित हो सकता है।

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