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ईरान युद्ध से केला निर्यात ठप, किसानों को भारी नुकसान का खतरा

Iran War banana farm

बुरहानपुर: रमजान और ईद के दौरान खाड़ी देशों में केले की बढ़ी हुई मांग महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के किसानों के लिए हमेशा उम्मीद की बड़ी वजह रही है। जलगांव और बुरहानपुर जैसे इलाकों के किसान साल भर मेहनत कर इसी मौसम का इंतजार करते हैं, क्योंकि इसी समय उनकी फसल विदेशों में अच्छे दाम पर बिकती है। लेकिन इस बार हालात पूरी तरह बदल गए हैं। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़े सैन्य संघर्ष ने केले के निर्यात को लगभग ठप कर दिया है। खेतों में तैयार फसल बाहर नहीं निकल पा रही है और जो माल ट्रकों और कंटेनरों के जरिए भेजा गया था, वह भी कई जगहों से वापस लौटाया जा रहा है।

खाड़ी देशों की ओर जाने वाले मार्ग बंद होने और बंदरगाहों पर माल अटक जाने से किसानों की सारी उम्मीदें टूट गई हैं। रमजान के समय आमतौर पर खुशियों से भरे रहने वाले इन गांवों में इस बार मायूसी और चिंता का माहौल है। बंपर उत्पादन के बावजूद बाजार तक फसल न पहुंच पाने के कारण किसान आर्थिक नुकसान, बढ़ते खर्च और बर्बाद होती फसल के संकट से जूझ रहे हैं। इस स्थिति ने न केवल किसानों की आय पर असर डाला है, बल्कि पूरे केले के निर्यात कारोबार को भी प्रभावित कर दिया है।

उम्मीदों पर फिरा पानी

बुरहानपुर के जैनाबाद में चार दशक से केले की खेती कर रहे किसान और किसान संगठन के अध्यक्ष शिवकुमार कुशवाहा बताते हैं कि जिले में एक जिला एक उत्पाद योजना के तहत हजारों किसान केले की खेती करते हैं। किसान कई उन्नत किस्मों की खेती करते हैं और अच्छी कमाई भी करते रहे हैं। बड़ी मात्रा में यहां से केले की खेप विदेशों में भेजी जाती है। लेकिन ईरान में जारी संघर्ष ने पूरे कारोबार को प्रभावित कर दिया है।

उनका कहना है कि पिछले चार-पांच वर्षों से केले की खेती प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रही थी और अब ईरान युद्ध ने स्थिति को और कठिन बना दिया है। अगर ईरान युद्ध की वजह से उत्पन्न हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो किसानों को पचास प्रतिशत से अधिक नुकसान हो सकता है। स्थानीय बाजार में जहां केले का भाव करीब दस रुपये प्रति किलोग्राम मिलता है, वहीं विदेशी बाजारों में यही भाव कई गुना अधिक हो जाता है। इसी वजह से बुरहानपुर के आधे से अधिक किसान केले की खेती करते हैं और इनमें भी जी–नौ किस्म की मांग विदेशों में अधिक रहती है।

लागत बढ़ने की चिंता

बुरहानपुर के ही दापोरा गांव के किसान गणेश पाटिल का कहना है कि ईरान युद्ध का असर आने वाले दिनों में और गंभीर हो सकता है। निर्यात बंद होने से किसानों की कमाई कम होगी और ईंधन महंगा होने के कारण खाद, पानी और छिड़काव की लागत भी बढ़ जाएगी। खेती की लागत बढ़ने से अगली फसल पर भी असर पड़ेगा।

गणेश पाटिल लगभग पचहत्तर एकड़ में केले की खेती करते हैं और करीब साठ हजार पौधे लगाए हुए हैं। एक पौधे पर करीब डेढ़ सौ रुपये तक लागत आती है। उन्होंने बताया कि रमजान के समय आमतौर पर बड़ी कमाई होती है, लेकिन इस बार निर्यात रुकने से पूरी योजना प्रभावित हो गई है। अभी जिले से रोज चालीस से पचास ट्रक केले की खेप बाहर जा रही है, लेकिन मार्च के अंत तक यह संख्या पांच सौ ट्रकों तक पहुंचने वाली थी।

बाजार में गिरते भाव

कुछ किसानों का मानना है कि फिलहाल स्थानीय बाजार में स्थिति ठीक है, लेकिन अगर युद्ध लंबा चला तो कीमतों पर असर पड़ सकता है। किसानों का कहना है कि निर्यात के लिए जाने वाले केले का भाव जहां करीब अठारह सौ रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच जाता है, वहीं निर्यात रुकने पर यही भाव घटकर एक हजार से बारह सौ रुपये प्रति क्विंटल तक आ सकता है।

जलगांव के रावेर क्षेत्र के किसान डीके महाजन बताते हैं कि केले की कई खेप रास्ते से ही वापस लौट आई है। अब किसानों को वही माल स्थानीय मंडियों में बेचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इससे लाखों रुपये का नुकसान हो रहा है और परिवहन खर्च भी दोगुना हो गया है। पहले जहां केले का भाव करीब दो हजार रुपये प्रति क्विंटल था, वह अब घटकर बारह सौ रुपये तक पहुंच गया है।

हजारों किसान प्रभावित

किसानों के अनुसार रमजान के समय रोजाना चार सौ से पांच सौ गाड़ियां केले से भरकर खाड़ी देशों के लिए निकलती थीं और हर गाड़ी में करीब पंद्रह टन तक माल होता था। लेकिन इस बार युद्ध के कारण यह पूरी व्यवस्था लगभग ठप हो गई है। जलगांव और बुरहानपुर के हजारों किसान इस संकट से प्रभावित हो रहे हैं। किसानों को उम्मीद है कि अगर जल्द ही संघर्ष समाप्त हो जाता है तो केले का निर्यात फिर से शुरू हो सकेगा और बाजार सामान्य हो जाएगा। लेकिन यदि हालात लंबे समय तक ऐसे ही बने रहे तो बागानों से लेकर बंदरगाहों तक बड़ी मात्रा में केला खराब हो सकता है और किसानों की मेहनत पर पानी फिर सकता है।

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