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बकरी पालन को ऐसे बनाएँ एक फायदेमंद व्यवसाय

नई दिल्ली: आमतौर पर भारत में बकरी पालन को मीट उत्पादन के लिए ही जाना जाता है, लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो बकरी से दूध उत्पादन कर भी अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। खासकर उन क्षेत्रों में जहां गाय या भैंस पालन मुश्किल है, वहां बकरी का दूध पोषण के लिहाज से बेहतर विकल्प बनकर उभर रहा है। हालांकि, यह भी सच है कि बकरी की दूध देने की क्षमता सीमित होती है। इसी वजह से दूध के लिए बकरी पालन व्यापक रूप से नहीं हो पाता। लेकिन अब गोट एक्सपर्ट्स की कुछ खास तकनीकों और पोषण प्रबंधन के जरिए बकरी के दूध उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर दूध देने वाली बकरियों की खुराक और देखरेख पर विशेष ध्यान दिया जाए, तो न सिर्फ दूध की मात्रा बढ़ती है, बल्कि बच्चे का स्वास्थ्य भी बेहतर रहता है। यही वजह है कि धीरे-धीरे देश के कई हिस्सों में दूध उत्पादन के लिए भी बकरी पालन को बढ़ावा दिया जा रहा है।

गोट विशेषज्ञ बताते हैं कि बकरी के गर्भवती होते ही उसके लिए विशेष खुराक की शुरुआत कर देनी चाहिए। गर्भावस्था के दौरान बकरी को सिर्फ खुद के लिए नहीं, बल्कि उसके पेट में पल रहे बच्चे के लिए भी अधिक ऊर्जा और पोषण की जरूरत होती है। इस दौरान बेहतर आहार न सिर्फ बच्चे के विकास में मदद करता है, बल्कि प्रसव के बाद दूध उत्पादन को भी बढ़ावा देता है। गर्भावस्था से दो हफ्ते पहले ही बकरी की सामान्य खुराक में बदलाव करने की सलाह दी जाती है। उदाहरण के तौर पर, अगर बकरी हर महीने औसतन 3 किलो दाना खा रही है, तो इस मात्रा को 100 से 200 ग्राम प्रति माह तक बढ़ा देना चाहिए। वहीं, जब बकरी बच्चे को जन्म देने के करीब हो, यानी एक से दो सप्ताह पहले, तब यह मात्रा 300 से 400 ग्राम तक बढ़ा देनी चाहिए। इसके साथ ही उसे उत्तम किस्म का हरा चारा, जैसे बरसीम, नेपियर घास या लोबिया, देना भी जरूरी है।

एक स्वस्थ बकरी जो 1 लीटर तक दूध देती है, उसे रोजाना करीब 300 ग्राम तक दाना देना चाहिए। इस दाने को दिन में दो बार देना फायदेमंद होता है ताकि पाचन प्रक्रिया बेहतर बनी रहे। साथ ही, बकरी को दिनभर में हरा और सूखा चारा मिलाकर लगभग 4 किलो तक खाना देना चाहिए। पानी की मात्रा का भी विशेष ध्यान रखना जरूरी है। सामान्य मौसम में 20 किलो वजन की बकरी को 700 मिलीलीटर तक पानी पिलाना पर्याप्त होता है, जबकि गर्मियों में यह मात्रा डेढ़ गुनी तक बढ़ा देनी चाहिए।

चाहे आप 100 बकरियों का व्यवसायिक फार्म चला रहे हों या घर के पीछे खाली जगह में 5 बकरियां पाल रहे हों, बकरियों को चरने के लिए खुली जगह की आवश्यकता होती है। यह जगह खेत, बाग या जंगल कुछ भी हो सकती है। चराई के तीन तरीके प्रमुख हैं — चराकर, खूंटे पर बांधकर, और दोनों का सम्मिलित रूप। बकरी की स्वच्छता, व्यायाम और प्राकृतिक आहार सुनिश्चित करने के लिए उसे नियमित रूप से चराई पर ले जाना चाहिए। बाजार में भले ही गाय और भैंस के दूध का बोलबाला हो, लेकिन बकरी का दूध भी अब धीरे-धीरे अपनी जगह बना रहा है। इसमें मौजूद एंटी एलर्जिक, हाई डाइजेस्टिबल और लो-लैक्टोज गुणों के कारण यह बच्चों और बुजुर्गों के लिए बहुत लाभकारी माना जाता है। यही वजह है कि बकरी के दूध की मांग शहरों, डेयरी उत्पादों की यूनिट और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक ग्राहकों के बीच बढ़ती जा रही है।

हाल ही में कई स्टार्टअप कंपनियां और डेयरी ब्रांड बकरी के दूध से दही, पनीर, बटर और आइसक्रीम जैसे उत्पादों का निर्माण कर रही हैं, जो स्थानीय किसानों के लिए नए बाजार के अवसर खोल रहे हैं। बकरी पालन अब केवल मीट तक सीमित नहीं रह गया है। समझदारी से खुराक प्रबंधन और देखभाल के साथ, यह व्यवसाय दूध उत्पादन के लिए भी लाभदायक विकल्प बन सकता है। विशेषज्ञों के सुझाव मानें तो बकरी का दूध उत्पादन सिर्फ बढ़ाया ही नहीं जा सकता, बल्कि इसकी गुणवत्ता को भी बेहतर बनाया जा सकता है। ऐसे में किसानों को चाहिए कि वे बकरी पालन को सिर्फ पारंपरिक नज़रिये से न देखें, बल्कि इसे व्यावसायिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अपनाएं, जिससे उन्हें बेहतर आमदनी मिल सके और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल सके।

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