नई दिल्ली: भारत में पशुपालन से जुड़े किसान अब तेजी से बकरी पालन की ओर बढ़ रहे हैं। गाय-भैंस की तुलना में बकरियों में बीमारियों का खतरा बेहद कम देखा गया है। गोट एक्सपर्ट्स का कहना है कि बकरियों की हार्ड इम्यूनिटी होती है, जिसके कारण साधारण बीमारियां बिना दवा के भी ठीक हो जाती हैं। यही वजह है कि जहां गाय और भैंस को थोड़ी सी बीमारी भी जल्दी लग जाती है, वहीं बकरियों पर गंभीर संक्रमण भी आसानी से हमला नहीं कर पाता। इसी कारण किसानों को बकरी पालन अपनाने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इसमें बीमारी का जोखिम बहुत कम और लाभ अधिक होता है।
कम बीमारी, ज्यादा फायदा: इसलिए बढ़ी बकरी पालन की डिमांड
विशेषज्ञों के अनुसार बकरी पालन दूध से ज्यादा बच्चों के उत्पादन के लिए किया जाता है। इन बच्चों को बड़ा करने के बाद मांस के लिए बाजार में बेचा जाता है, जहां इनकी अधिक कीमत मिलती है। लेकिन इस मुनाफे तक पहुंचने के लिए जरूरी है कि बकरियों की मृत्यु दर कम रखी जाए और इसके लिए समय पर टीकाकरण सबसे अहम है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि बकरियों में बीमारी का खतरा इतना कम है कि वैक्सीनेशन करा कर इस जोखिम को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है। साथ ही अगर बीमारी के शुरुआती लक्षण पहचान लिए जाएं, तो समय पर इलाज कर नुकसान को रोका जा सकता है।
किस उम्र में कौन सा टीका जरूरी? यहां जानिए पूरा वैक्सीनेशन प्लान
खुरपका: बकरी को 3 से 4 महीने की उम्र में पहला टीका लगवाना चाहिए। इसके बाद 3 से 4 सप्ताह में बूस्टर डोज दें और 6 माह बाद दोबारा वैक्सिनेशन कराएं।
बकरी चेचक: 3 से 5 महीने की उम्र पर पहला टीका लगवाएं। इसके बाद एक माह में बूस्टर डोज। यह टीका हर साल लगवाना जरूरी है।
गलघोंटू: पहली डोज 3 महीने की उम्र पर और बूस्टर डोज 23 से 30 दिनों में।
पीपीआर (बकरी प्लेग): तीन महीने पर पहली डोज। बूस्टर की जरूरत नहीं, लेकिन तीन वर्ष की उम्र में दोबारा डोज लगवाएं।
इंटरोटॉक्सिमिया: 3 से 4 महीने पर पहला टीका, 3 से 4 हफ्ते बाद बूस्टर और हर साल एक माह के अंतराल पर दो बार।
कब दें दवाएं? बीमारी रोकथाम का पूरा शेड्यूल
कुकड़िया रोग: 2 से 3 महीने की उम्र पर 3 से 5 दिन दवाई दें। 6 माह पर दोबारा दवा पिलाएं।
डिवार्मिंग: 3 महीने की उम्र से शुरुआत करें। बारिश शुरू होने और खत्म होने पर दवा दें। सभी पशुओं को सालभर दवा पिलाना जरूरी।
डिपिंग: किसी भी उम्र में दवा दी जा सकती है। ठंड के शुरू और अंत में कराएं और पूरे झुंड को साल में एक बार नहलाएं।
कौन सी रेग्युलर जांच जरूरी? विशेषज्ञों की चेतावनी
ब्रुसेल्लोसिस: बकरी की उम्र 6 और 12 महीने होने पर जांच कराएं। यदि कोई पशु संक्रमित मिले तो उसे गहरे गड्ढे में दफनाना चाहिए ताकि संक्रमण न फैले।
जोहनीज (JD): 6 और 12 महीने पर जांच आवश्यक। संक्रमित पशु को तुरंत झुंड से अलग कर देना चाहिए।
क्यों बकरी पालन सुरक्षित निवेश माना जाता है?
कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि बकरियों की देखभाल आसान है, पालन का खर्च कम है और बीमारी का जोखिम न्यूनतम है। यही कारण है कि किसान, विशेष रूप से छोटे व सीमांत कृषि परिवार, बकरी पालन से अच्छा मुनाफा हासिल कर रहे हैं। यह पशुपालन सेक्टर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहा है और आने वाले वर्षों में इसकी डिमांड और बढ़ने की उम्मीद है।
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