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PM-AASHA से किसानों को मिलेगा फसल के उचित दाम का सुरक्षा कवच

Farmers will get fair prices for their crops through PM-AASHA

नई दिल्ली: खेती में किसान की चिंता सिर्फ फसल उगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उपज को सही कीमत पर बेचना भी बड़ी चुनौती है। कई बार मंडी में भाव इतना गिर जाता है कि किसान को लागत से भी कम कीमत पर फसल बेचनी पड़ती है। किसानों को ऐसी स्थिति से बचाने और न्यूनतम समर्थन मूल्य का प्रभावी लाभ दिलाने के लिए केंद्र सरकार प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (PM-AASHA) चला रही है।

2018 में शुरू हुई थी पीएम-आशा योजना

केंद्र सरकार ने सितंबर 2018 में पीएम-आशा योजना शुरू की थी। इसका उद्देश्य किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य दिलाना और कृषि जिंसों की कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना है। योजना के तहत खासतौर पर दालों, तिलहन और खोपरा की खरीद की जाती है। जब बाजार भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे चला जाता है, तो सरकारी खरीद या मूल्य अंतर भुगतान जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से किसानों को राहत दी जा सकती है। इससे किसानों को मजबूरी में कम कीमत पर उपज बेचने से बचाने में मदद मिलती है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे भाव होने पर सरकारी खरीद

पीएम-आशा के तहत मूल्य समर्थन योजना महत्वपूर्ण व्यवस्था है। जब दालों, तिलहन या खोपरा का बाजार भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे चला जाता है, तो सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों से उपज खरीद सकती है। राज्य सरकारों के अनुरोध पर नेफेड और एनसीसीएफ जैसी एजेंसियों के माध्यम से खरीद की जाती है। वर्ष 2024-25 से दालों, तिलहन और खोपरा की खरीद के लिए सामान्य तौर पर राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के कुल उत्पादन के 25 प्रतिशत तक खरीद की अनुमति है। वहीं देश में दलहन उत्पादन बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से तुअर, उड़द और मसूर की खरीद राज्य के उत्पादन के 100 प्रतिशत तक की जा सकती है।

कीमतों में तेजी आने पर भी सरकार करती है हस्तक्षेप

पीएम-आशा के तहत मूल्य स्थिरीकरण कोष भी काम करता है। इसका उद्देश्य प्याज, आलू और दाल जैसी जरूरी वस्तुओं की कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकना है। जब कीमतें कम होती हैं, तब इन वस्तुओं की खरीद कर भंडार तैयार किया जा सकता है। बाजार में कीमतें बढ़ने पर इस भंडार से आपूर्ति बढ़ाने की कोशिश की जाती है। इससे उपभोक्ताओं को महंगाई से राहत देने के साथ बाजार में कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।

बाजार भाव कम होने पर खाते में मिल सकता है अंतर

मूल्य अंतर भुगतान योजना के तहत सरकार किसान की पूरी उपज खरीदने के बजाय न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाजार में मिले वास्तविक भाव के बीच का अंतर किसान को दे सकती है। यह राशि सीधे किसान के बैंक खाते में भेजी जाती है। यह व्यवस्था मुख्य रूप से तिलहन के लिए इस्तेमाल की जाती है और भुगतान न्यूनतम समर्थन मूल्य के अधिकतम 15 प्रतिशत तक हो सकता है। इससे किसानों को मूल्य सुरक्षा मिलती है और सरकार को बड़ी मात्रा में उपज खरीदकर रखने के लिए अतिरिक्त भंडारण की जरूरत भी कम होती है।

टमाटर, प्याज और आलू के भाव गिरने पर बाजार हस्तक्षेप

टमाटर, प्याज और आलू जल्दी खराब होने वाली फसलें हैं। इनकी कीमतों में अचानक गिरावट आने पर किसानों को भारी नुकसान हो सकता है। इन फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य लागू नहीं होता। ऐसी स्थिति में बाजार हस्तक्षेप योजना के जरिए सरकार सहायता कर सकती है। जब इन उत्पादों की कीमत पिछले सामान्य मौसम की तुलना में कम से कम 10 प्रतिशत गिरती है, तो योजना के तहत बाजार में हस्तक्षेप किया जा सकता है। नेफेड और एनसीसीएफ जैसी एजेंसियों के माध्यम से खरीद और अन्य सहायता दी जाती है।

2026-27 में 7,200 करोड़ रुपये का बजट

सरकार ने पीएम-आशा के लिए बजट में भी बढ़ोतरी की है। वर्ष 2024-25 में योजना पर वास्तविक खर्च 5,437.99 करोड़ रुपये रहा था। वर्ष 2025-26 में 6,941.36 करोड़ रुपये का बजट रखा गया था। अब वर्ष 2026-27 के लिए इसे बढ़ाकर 7,200 करोड़ रुपये कर दिया गया है। बजट में बढ़ोतरी से संकेत मिलता है कि सरकार किसानों को फसल की कीमतों में गिरावट से सुरक्षा देने और खरीद व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दे रही है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य और उत्पादन लागत के बीच अंतर

न्यूनतम समर्थन मूल्य किसानों के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे उन्हें अपनी उपज के लिए एक तय मूल्य का भरोसा मिलता है। वर्ष 2026-27 में कई फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य उनकी उत्पादन लागत से ऊपर रखा गया है। सामान्य धान की उत्पादन लागत 1,627 रुपये प्रति क्विंटल बताई गई है, जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,441 रुपये है। इसी तरह पीले सोयाबीन की लागत 3,805 रुपये और न्यूनतम समर्थन मूल्य 5,708 रुपये प्रति क्विंटल है। गेहूं की उत्पादन लागत 1,239 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,585 रुपये है। जूट की लागत 3,662 रुपये और न्यूनतम समर्थन मूल्य 5,925 रुपये प्रति क्विंटल है।

डिजिटल व्यवस्था से खरीद में बढ़ी पारदर्शिता

सरकार ने पीएम-आशा के तहत खरीद प्रक्रिया में डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाया है। किसानों का जैविक पहचान और आधार आधारित प्रमाणीकरण किया जा रहा है। पंजीकृत किसानों से सीधे खरीद की व्यवस्था भी लागू की गई है। ई-नाम, ई-समृद्धि और ई-संयुक्ति जैसे डिजिटल मंचों के माध्यम से खरीद प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने की कोशिश की जा रही है। इसका उद्देश्य योजना का लाभ वास्तविक किसानों तक पहुंचाना है।

बिहार में मसूर की खरीद को मिली मजबूती

बिहार में पीएम-आशा के तहत मसूर की खरीद को मजबूत किया गया है। एनसीसीएफ के माध्यम से पहली बार संगठित तरीके से मसूर की खरीद शुरू की गई है। इसके लिए 48 पैक्स और किसान उत्पादक संगठनों को जोड़ा गया है। 10 अगस्त 2026 तक एनसीसीएफ ने 1,042.65 मीट्रिक टन मसूर खरीदी। इसमें 358 किसानों का पंजीकरण हुआ और 285 किसानों को लाभ मिला। इसी अवधि में नेफेड ने 1,814.13 मीट्रिक टन मसूर खरीदी और 455 किसानों को इसका लाभ मिला।

छत्तीसगढ़ में भी किसानों को मिला फायदा

छत्तीसगढ़ में पीएम-आशा के तहत चना, मसूर और सरसों की खरीद की जा रही है। 10 अगस्त 2026 तक एनसीसीएफ ने 18,392.228 मीट्रिक टन चना, 22.231 मीट्रिक टन मसूर और 1,035.0205 मीट्रिक टन सरसों खरीदी। इस दौरान 21,721 किसानों का पंजीकरण हुआ और 13,790 किसानों को लाभ मिला। वहीं नेफेड ने 17,020.65 मीट्रिक टन चना और 355.05 मीट्रिक टन मसूर की खरीद की।

किसानों को बेहतर दाम दिलाना है मुख्य लक्ष्य

पीएम-आशा का उद्देश्य किसानों को केवल सरकारी खरीद का लाभ देना नहीं, बल्कि बाजार में कीमत गिरने की स्थिति में सुरक्षा उपलब्ध कराना भी है। फसल का भाव कम होने पर सरकारी खरीद, मूल्य अंतर भुगतान और बाजार हस्तक्षेप जैसी व्यवस्थाएं किसानों के लिए सहारा बन सकती हैं। डिजिटल तकनीक, ई-नाम, भंडारण और कृषि अवसंरचना को मजबूत करने के साथ सरकार खेत से बाजार तक की व्यवस्था सुधारने पर भी जोर दे रही है। योजना के जरिए कोशिश है कि किसान को उसकी मेहनत का उचित दाम मिले और उसे मजबूरी में कम कीमत पर अपनी उपज बेचने की स्थिति का सामना न करना पड़े।

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