नई दिल्ली: देशभर में इन दिनों किसान खाद की गंभीर किल्लत से जूझ रहे हैं। अलग-अलग राज्यों से हर रोज तस्वीरें सामने आ रही हैं, जहां किसान खाद के लिए लंबी-लंबी लाइनों में खड़े हैं, कहीं बारिश में भीगते हुए इंतजार कर रहे हैं तो कहीं अनशन पर बैठ गए हैं। कई जगह तो किसानों को पुलिस की लाठियों का भी सामना करना पड़ रहा है, लेकिन इसके बावजूद एक-एक बोरी खाद के लिए संघर्ष जारी है। विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर खाद नहीं मिलने से धान की फसल की पैदावार पर सीधा असर पड़ेगा।
धान की खेती में खाद की अहम भूमिका
भारत में बड़े पैमाने पर धान की खेती की जाती है और इसकी अच्छी उपज के लिए यूरिया जैसे उर्वरक बेहद जरूरी हैं। आमतौर पर धान की फसल में दो बार खाद डाली जाती है। पहली बार बुवाई के 15 से 30 दिनों के भीतर और दूसरी बार जब पौधे में बालियां निकलने लगती हैं। यदि इस दौरान खाद की उपलब्धता न हो तो फसल कमजोर पड़ जाती है और उत्पादन पर बड़ा असर पड़ता है।
यूरिया की कमी से पौधों की वृद्धि रुकती है
धान की खेती में नाइट्रोजन सबसे जरूरी पोषक तत्व है, और यूरिया इसका प्रमुख स्रोत है। समय पर यूरिया न मिलने से पौधों की वृद्धि रुक जाती है। धान के पौधे छोटे और कमजोर हो जाते हैं। मौजूदा हालात में जहां किसान खाद के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहां फसल का विकास बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।
पत्तियों का पीलापन और सूखना
यदि खेतों में समय से यूरिया नहीं डाला गया तो धान की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं। धीरे-धीरे ये पत्तियां सूख जाती हैं और पौधा कमजोर हो जाता है। यह स्थिति किसानों के लिए और भी बड़ी समस्या खड़ी कर सकती है क्योंकि कमजोर पौधों से उपज की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है।
पैदावार में भारी कमी की आशंका
विशेषज्ञों का कहना है कि धान की फसल में यूरिया की जरूरत दो बार पड़ती है, लेकिन इस सीजन में कई किसानों के खेतों में एक बार भी छिड़काव नहीं हो पाया है। नतीजतन, पौधों का विकास रुक गया है और इससे पैदावार पर सीधा असर पड़ेगा। अगर स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो किसानों को बड़ी आर्थिक हानि झेलनी पड़ सकती है।
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