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मक्के के गिरते दाम और अंतरराष्ट्रीय दबाव ने किसानों की बढ़ाई चिंता

देश में मक्का की खेती करने वाले किसानों के लिए मौजूदा समय संकट से कम नहीं है। बीते कई हफ्तों से मक्के के दाम में भारी गिरावट देखी जा रही है। केंद्र सरकार द्वारा मक्के का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 2400 रुपये प्रति क्विंटल तय किए जाने के बावजूद किसान अपनी उपज को इससे कहीं कम दाम पर बेचने को मजबूर हैं। देश के कई राज्यों की मंडियों में मक्के की कीमतें निर्धारित एमएसपी से सैकड़ों रुपये नीचे चल रही हैं। मध्य प्रदेश, जो मक्का उत्पादन में देश का दूसरा सबसे बड़ा राज्य है, वहां 7 जुलाई को सीहोर मंडी में मक्के का न्यूनतम रेट सिर्फ 1751 रुपये प्रति क्विंटल दर्ज किया गया, जो एमएसपी से करीब 650 रुपये कम है। यही नहीं, अन्य मंडियों में भी हालात बहुत बेहतर नहीं हैं। हरदा, सिवनी, टिमरनी, अलीराजपुर और इंदौर जैसी मंडियों में भी मक्का किसानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है।

अन्य राज्यों में भी यही स्थिति देखने को मिल रही है। उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात और तमिलनाडु की मंडियों में मक्के के भाव एमएसपी से नीचे चल रहे हैं। पंजाब की रय्या मंडी में तो न्यूनतम रेट सिर्फ 1450 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है, जो एमएसपी से लगभग 950 रुपये कम है। आश्चर्य की बात यह है कि इथेनॉल और पोल्ट्री फीड के लिए मक्के की मांग लगातार बढ़ रही है। सरकार खुद इथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के की खेती को बढ़ावा दे रही है। देश में फिलहाल कुल इथेनॉल उत्पादन का लगभग 51 प्रतिशत हिस्सा मक्के से आता है। बावजूद इसके, किसानों को मक्का बेचने पर वाजिब दाम नहीं मिल पा रहा है, जिससे उनकी लागत भी पूरी नहीं हो रही है।

किसानों की चिंताओं को और गहरा करने वाली एक और बात सामने आ रही है। अमेरिका के साथ एक संभावित व्यापारिक समझौते में अगर भारत पर मक्के के आयात को लेकर कोई शर्त थोप दी गई, तो घरेलू बाजार में सस्ता मक्का आ सकता है, जिससे भारतीय किसानों की स्थिति और खराब हो जाएगी। किसानों को डर है कि अगर यह समझौता हुआ, तो उन्हें न केवल नुकसान झेलना पड़ेगा, बल्कि उन्हें मक्का की खेती छोड़ने पर भी मजबूर होना पड़ सकता है। किसानों का साफ कहना है कि सिर्फ न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करना पर्याप्त नहीं है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उन्हें यह मूल्य वास्तव में मिले भी। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों में घरेलू किसानों के हितों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

देश में मक्के की खेती एक बड़ा हिस्सा है और यह फसल इथेनॉल, पशु चारा और खाद्य सुरक्षा तीनों ही मोर्चों पर अहम भूमिका निभाती है। ऐसे में किसानों को उचित दाम दिलाना केवल एक आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक जरूरत भी है। अगर सरकार समय रहते ठोस कदम नहीं उठाती, तो यह संकट और गहरा हो सकता है और मक्का किसानों के लिए यह दौर और भी मुश्किल बन जाएगा।

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