Site icon Agriculture| Kheti| Krishi| Farm| Farmer| Agriculture| News

इथेनॉल उत्पादन में पानी की भारी खपत पर बढ़ा विवाद

Ethanol production

नई दिल्ली: इथेनॉल उत्पादन में पानी की अत्यधिक खपत को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। एक लीटर इथेनॉल के लिए दस हजार लीटर से अधिक पानी खर्च होने के तथ्य सामने आने के बाद इस उद्योग से जुड़े लाभार्थियों में बेचैनी बढ़ गई है। उद्योग से जुड़े संगठन यह दावा कर रहे हैं कि कारखानों में केवल तीन से पांच लीटर पानी में इथेनॉल तैयार हो जाता है, लेकिन विशेषज्ञ इसे भ्रामक बताते हुए कहते हैं कि यह आंशिक सच है। वास्तविकता यह है कि अनाज उगाने में लगने वाले पानी को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है, जिसे पर्यावरण विज्ञान में जल पदचिह्न कहा जाता है।

इथेनॉल और पानी का वास्तविक गणित

विशेषज्ञों के अनुसार धान की खेती में पानी की खपत को समझे बिना इथेनॉल के पानी उपयोग का सही आकलन संभव नहीं है। एक हेक्टेयर में धान उगाने के लिए पूरे मौसम में लगभग एक करोड़ पचास लाख लीटर पानी की जरूरत होती है, जिससे करीब तीन हजार किलोग्राम चावल पैदा होता है। इस हिसाब से एक किलोग्राम चावल उगाने में करीब पांच हजार लीटर पानी खर्च होता है।

दूसरी ओर, एक टन चावल से लगभग चार सौ से साढ़े चार सौ लीटर इथेनॉल तैयार होता है। इसका मतलब है कि एक लीटर इथेनॉल बनाने के लिए करीब ढाई किलोग्राम चावल की आवश्यकता पड़ती है। इस गणित के आधार पर स्पष्ट है कि एक लीटर इथेनॉल उत्पादन में दस हजार लीटर से अधिक पानी की खपत होती है।

किसानों पर दबाव, उद्योग को छूट

इस मुद्दे पर नीतिगत विरोधाभास भी सामने आया है। एक तरफ किसानों को भूजल दोहन के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए धान की खेती छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर उसी धान के टूटे चावल को इथेनॉल उद्योग के लिए सुरक्षित रखा जा रहा है। किसानों को पराली जलाने और पानी खर्च करने के लिए दोषी ठहराया जाता है, लेकिन उद्योगों की इस भारी जल खपत पर चुप्पी साध ली जाती है।

नीतियों पर उठे सवाल

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जल संरक्षण को लेकर गंभीरता है तो नीतियों में पारदर्शिता जरूरी है। या तो किसानों को वैकल्पिक फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी दी जाए या फिर अनाज आधारित इथेनॉल उत्पादन करने वाली कंपनियों के जल उपयोग का कड़ा मूल्यांकन किया जाए। इसके साथ ही पर्यावरणीय नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए, ताकि जल संसाधनों का संतुलित उपयोग हो सके और भविष्य में पानी का संकट और गहराने से रोका जा सके।

ये भी पढ़ें: यूपी में फसल नुकसान पर राहत, किसानों को जल्द मिलेगा मुआवजा

Exit mobile version