भागलपुर: मॉनसून आते ही बिहार में बड़े पैमाने पर धान की खेती शुरू होती है। लेकिन इसके साथ ही बाढ़ का खतरा भी मंडराने लगता है, जिससे हर साल किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ता है। उत्तर और दक्षिण बिहार के कई जिले लगातार इस समस्या से जूझते रहे हैं। अब किसानों के लिए खुशखबरी है। दरअसल, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर (भागलपुर) ने ऐसी उन्नत धान किस्में विकसित की हैं जो बाढ़ और रोगों की चुनौती में भी बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। इनमें प्रमुख हैं सबौर श्री सब-1, सबौर कतरनी धान-1 और सबौर विभूति धान।
बाढ़ और जलवायु संकट में कारगर धान किस्में
बीते दिनों बीएयू के कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह ने इन किस्मों का फील्ड निरीक्षण किया और कहा कि बदलते जलवायु संकट और बढ़ती आपदाओं के बीच ये किस्में समय की आवश्यकता हैं। विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशक डॉ. ए. के. सिंह ने बताया कि हाल की बाढ़ और रोगों के दौर में इन किस्मों की सफलता ने साबित कर दिया है कि ये धान बिहार के किसानों के लिए वरदान साबित होंगी।
सबौर श्री सब-1: जलमग्नता में भी अच्छी पैदावार
वैज्ञानिकों ने मार्कर-असिस्टेड ब्रिडिंग से विकसित की गई किस्म सबौर श्री सब-1 (BRR0266/IET32122) को सबसे बेहतर बताया। यह किस्म 14 दिनों तक जलमग्न रहने के बाद भी 30-35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की उपज देती है। सामान्य परिस्थितियों में इसकी उपज 50-55 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच जाती है। यह किस्म 140-145 दिनों में पक जाती है और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए आदर्श है।
सबौर विभूति धान: रोग प्रतिरोधी और अधिक उत्पादन वाली किस्म
सबौर विभूति धान इस साल 7–8 दिन तक जलमग्न रहने के बाद भी सिर्फ 5-10% तक क्षति झेल सकी। इसमें बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट (BLB) के खिलाफ तीन प्रतिरोधी जीन मौजूद हैं और यह ब्लास्ट रोग को भी सहन कर सकती है। यह अर्ध-बौनी किस्म 135-140 दिनों में तैयार होती है और सामान्य परिस्थितियों में औसतन 55-60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की उपज देती है। अनुकूल परिस्थितियों में इसकी उपज 85 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो सकती है।
सबौर कतरनी धान-1: जीआई टैग वाली कतरनी का विकल्प
भागलपुर की जीआई टैग कतरनी धान अपने स्वाद और सुगंध के लिए प्रसिद्ध है। इसकी टक्कर की किस्म के रूप में विश्वविद्यालय ने सबौर कतरनी धान-1 विकसित की है। यह किस्म 110-115 सेमी ऊंची होती है, जिससे गिरने का खतरा कम रहता है। इसकी उपज 42-45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है और यह 135-140 दिनों में तैयार हो जाती है।
किसानों के लिए वरदान साबित होंगी नई किस्में
बिहार में हर साल करीब 30 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती होती है, लेकिन बाढ़, जलमग्नता और रोगों की वजह से किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान इन नई किस्मों की खेती अपनाएं तो नुकसान कम होगा और उनकी आय में सुधार होगा।
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