नई दिल्ली: देश में जीरा फसल के नए सीजन की आवक शुरू होते ही उत्पादन और बाजार को लेकर स्थिति साफ होने लगी है। इस साल कम रकबा, कमजोर सर्दी, बढ़ता तापमान और ब्लाइट बीमारी जैसी समस्याओं ने जीरा उत्पादन पर दबाव बढ़ा दिया है। इसके साथ ही पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण निर्यात गतिविधियों पर भी असर पड़ा है, जिससे घरेलू बाजार में कारोबारी फिलहाल सतर्क रुख अपनाए हुए हैं।
उत्पादन में गिरावट का अनुमान
मसाला उद्योग से जुड़ी संस्था फेडरेशन ऑफ इंडियन स्पाइस स्टेकहोल्डर्स के अनुसार वर्ष 2026 में देश का जीरा उत्पादन करीब 5 प्रतिशत घटकर लगभग 5.13 लाख टन रहने का अनुमान है। पिछले वर्ष यह उत्पादन करीब 5.38 लाख टन रहा था। 55 किलोग्राम की बोरियों के हिसाब से यह उत्पादन करीब 93.29 लाख बैग बैठता है, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा लगभग 97.93 लाख बैग था।
गुजरात में गिरावट, राजस्थान में बढ़ोतरी संभव
राज्यवार स्थिति देखें तो गुजरात में उत्पादन में बड़ी गिरावट की आशंका जताई जा रही है। यहां जीरा का रकबा करीब 18 प्रतिशत घटा है और उपज में भी लगभग 11 प्रतिशत कमी का अनुमान है, जिसके कारण कुल उत्पादन करीब 27 प्रतिशत गिरकर लगभग 1.83 लाख टन रह सकता है। वहीं राजस्थान में रकबा बढ़ने और बेहतर पैदावार के चलते उत्पादन करीब 15 प्रतिशत बढ़कर 3.29 लाख टन तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है।
मसाला उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि फसल की स्थिति सामान्य है, लेकिन पिछले साल की तुलना में उत्पादन कुछ कम रह सकता है। उनका मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष लंबा खिंचता है तो निर्यात पर असर पड़ेगा और इसका प्रभाव कीमतों पर भी देखने को मिल सकता है।
अधिक तापमान से उपज प्रभावित
राजस्थान के मसाला कारोबारियों के अनुसार इस साल जीरा उत्पादन अनुमान से कम रह सकता है। उद्योग से जुड़े व्यापारियों का कहना है कि फसल के दौरान सामान्य से अधिक तापमान रहने के कारण उपज प्रभावित हुई है। उनका अनुमान है कि इस वर्ष कुल उत्पादन करीब 80 से 82 लाख बैग तक रह सकता है।
हालांकि बाजार में करीब 20 लाख बैग का कैरीओवर स्टॉक मौजूद है। इसे जोड़ने के बाद कुल आपूर्ति एक करोड़ बैग से अधिक रहने की संभावना है। इसमें से लगभग 60 से 65 लाख बैग घरेलू खपत में इस्तेमाल होंगे, जबकि बाकी मात्रा निर्यात के लिए उपलब्ध रह सकती है। नई फसल की आवक शुरू होने के साथ ही कच्चे जीरे की कीमतों में भी नरमी देखी जा रही है और फिलहाल यह करीब 180 से 190 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास कारोबार कर रहा है।
किसानों ने जीरे की जगह सरसों को दी प्राथमिकता
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इस साल कई किसानों ने जीरे की जगह सरसों की खेती को प्राथमिकता दी। बुवाई के समय अच्छी बारिश होने के कारण किसानों को सरसों ज्यादा सुरक्षित विकल्प लगा, जिससे जीरा का रकबा घट गया। इसके अलावा सर्दियों की अवधि सामान्य से कम रहने और तापमान में अचानक बढ़ोतरी का असर भी जीरा फसल पर पड़ा है।
ब्लाइट बीमारी से बढ़ी चिंता
कई क्षेत्रों में जीरा फसल पर ब्लाइट बीमारी के मामले भी सामने आने लगे हैं, जिससे उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ गई है। मसाला निर्यात से जुड़े कुछ व्यापारियों का अनुमान है कि इस साल जीरा उत्पादन 20 प्रतिशत तक घटकर करीब 4.4 लाख टन रह सकता है। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में फसल अपेक्षाकृत कमजोर बताई जा रही है, जबकि राजस्थान में स्थिति कुछ बेहतर है।
निर्यात पर युद्ध का असर
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण फिलहाल निर्यात गतिविधियां धीमी पड़ी हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगले दो से तीन सप्ताह तक निर्यात मांग कमजोर रह सकती है। अप्रैल के पहले सप्ताह से इसमें कुछ सुधार आने की संभावना जताई जा रही है। फिलहाल स्पॉट बाजार में जीरे की कीमतें लगभग 4,200 रुपये प्रति 20 किलोग्राम के आसपास बनी हुई हैं।
कुछ व्यापारियों को उत्पादन बढ़ने की उम्मीद
हालांकि मसाला व्यापार के एक वर्ग का मानना है कि इस साल उत्पादन में हल्की बढ़ोतरी भी हो सकती है। कोच्चि में आयोजित इंटरनेशनल स्पाइस कॉन्फ्रेंस 2026 में प्रस्तुत एक रिपोर्ट के अनुसार बेहतर पैदावार के चलते देश का कुल जीरा उत्पादन 5 से 7 प्रतिशत बढ़कर लगभग 5.3 से 5.4 लाख टन तक पहुंच सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि गुजरात में रकबा घटने से उत्पादन में कमी जरूर आएगी, लेकिन राजस्थान में बढ़े रकबे और बेहतर उपज से इसकी आंशिक भरपाई हो सकती है। निर्यात के मोर्चे पर भी हाल के महीनों में गिरावट दर्ज की गई है। अप्रैल से दिसंबर 2025 के दौरान भारत से जीरा निर्यात करीब 12 प्रतिशत घटकर 1.56 लाख टन रह गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 1.78 लाख टन था। मूल्य के लिहाज से निर्यात 585 मिलियन डॉलर से घटकर करीब 418 मिलियन डॉलर पर आ गया।
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