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ग्राफ्टिंग तकनीक से टमाटर की खेती यानी कम लागत में ज्यादा मुनाफा

नई दिल्ली: भारत में पारंपरिक खेती को आधुनिक और लाभकारी बनाने की दिशा में लगातार प्रयास हो रहे हैं। इसी कड़ी में ग्राफ्टिंग तकनीक एक बड़ी क्रांति के रूप में उभर रही है, जो खासतौर पर टमाटर की खेती में किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण बन चुकी है। जलवायु परिवर्तन, मिट्टी की बिगड़ती गुणवत्ता और कीटों की बढ़ती समस्या ने किसानों को पारंपरिक तरीकों से हटकर नई तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित किया है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि ग्राफ्टिंग तकनीक न केवल उत्पादन को बढ़ाती है, बल्कि फसल को अधिक टिकाऊ और रोग प्रतिरोधक भी बनाती है। इस तकनीक की खासियत यह है कि यह टमाटर जैसी नकदी फसल में किसानों को कम लागत में ज्यादा उपज और बेहतर बाजार मूल्य दिलाने की क्षमता रखती है। कई राज्यों में किसान इस तकनीक को अपनाकर अच्छा खासा मुनाफा भी कमा रहे हैं, और अब यह तकनीक देश के अन्य हिस्सों में भी तेजी से लोकप्रिय हो रही है।

क्या है ग्राफ्टिंग तकनीक?

ग्राफ्टिंग एक ऐसी वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें दो अलग-अलग पौधों के हिस्सों को जोड़कर एक नया और अधिक सक्षम पौधा तैयार किया जाता है। इस प्रक्रिया में एक मजबूत और रोग प्रतिरोधक पौधे को रूटस्टॉक के रूप में लिया जाता है, जबकि बेहतर गुणवत्ता और अधिक उपज देने वाले पौधे के हिस्से को स्कियन के रूप में चुना जाता है। दोनों को 45 डिग्री के कोण पर काटकर एक-दूसरे से जोड़ा जाता है और विशेष क्लिप्स या टेप की मदद से मजबूती से बांधा जाता है। टमाटर की खेती में ऐसे रूटस्टॉक का चयन किया जाता है जो मिट्टीजनित बीमारियों और प्रतिकूल मौसम को झेल सकें। वहीं स्कियन ऐसी किस्मों से लिया जाता है जो अधिक उत्पादन, बेहतर स्वाद और गुणवत्ता के लिए जाने जाते हैं। यह संयोजन एक ऐसे पौधे को जन्म देता है जो उत्पादन, गुणवत्ता और जीवनकाल—तीनों में पारंपरिक पौधों से बेहतर होता है।

ग्राफ्टिंग कैसे की जाती है?

ग्राफ्टिंग की प्रक्रिया की शुरुआत उच्च गुणवत्ता वाले बीजों के चयन से होती है, जो स्थानीय मौसम और मिट्टी के अनुसार हों। रूटस्टॉक और स्कियन के पौधों को अलग-अलग ट्रे या गमलों में उगाया जाता है। जब दोनों पौधे लगभग 3-4 इंच ऊंचाई तक पहुंच जाते हैं, तब उन्हें 45 डिग्री कोण पर काटा जाता है और एक-दूसरे से जोड़कर क्लिप्स की मदद से बांधा जाता है। इसके बाद पौधों को 7 से 10 दिन तक ऐसी जगह रखा जाता है जहां नमी बनी रहे और रोशनी न हो। फिर धीरे-धीरे इन पौधों को धूप और खुले वातावरण में लाया जाता है और जब ये पूरी तरह से विकसित हो जाते हैं, तब खेत में रोपण किया जाता है।

ग्राफ्टिंग के फायदे क्या हैं?

ग्राफ्टिंग तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इससे तैयार पौधे सामान्य पौधों की तुलना में 25 से 30 प्रतिशत तक अधिक उपज देते हैं। रूटस्टॉक की मजबूती के कारण पौधे सूखा, गर्मी और मिट्टीजनित रोगों को झेलने में सक्षम होते हैं। इससे कीटनाशकों, उर्वरकों और रासायनिक दवाओं की जरूरत घट जाती है, जिससे खेती की लागत कम होती है। साथ ही फसल की उम्र अधिक होती है, जिससे बार-बार बोवनी की आवश्यकता नहीं पड़ती।

कैसे बढ़ता है मुनाफा?

ग्राफ्टिंग से तैयार टमाटर बाजार में अधिक मांग और मूल्य पाते हैं क्योंकि ये स्वाद, आकार और रंग में बेहतर होते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक किसान प्रति एकड़ 20 से 25 क्विंटल तक अतिरिक्त उत्पादन ले सकते हैं। यही कारण है कि अब देश के अलग-अलग हिस्सों में किसान इस तकनीक की ट्रेनिंग लेने लगे हैं और इसके प्रति उनकी रुचि बढ़ती जा रही है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संदर्भ में भी यह तकनीक फायदेमंद है। यदि किसानों को सही जानकारी, प्रशिक्षण और संसाधन मिलें तो यह तकनीक खेती को जोखिम से निकालकर लाभ का माध्यम बना सकती है। साथ ही यह स्थायी खेती की ओर भी एक ठोस कदम हो सकता है। आज के समय में जब खेती जलवायु, बाजार और लागत के जोखिमों से घिरी है, ग्राफ्टिंग तकनीक किसानों के लिए एक सुरक्षित, वैज्ञानिक और लाभकारी समाधान बनकर उभर रही है। सरकार और कृषि विज्ञान केंद्रों को चाहिए कि इस तकनीक को और अधिक किसानों तक पहुंचाने के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम और जागरूकता अभियान चलाए जाएं, ताकि भारत में खेती फिर से लाभकारी और टिकाऊ बन सके।

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