नई दिल्ली: भारत में मिर्च को मसालों का राजा माना जाता है, क्योंकि इसके बिना चटपटा भोजन अधूरा माना जाता है। लेकिन हाल के दिनों में बदलते मौसम ने मिर्च की खेती को गहरा झटका दिया है। तापमान में लगातार हो रहे उतार-चढ़ाव और वातावरण में नमी के कारण मिर्च की फसलों पर कीटों का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। हैरान करने वाली बात यह है कि मिर्च उन गिनी-चुनी फसलों में शामिल है, जिन पर पत्तियां खाने और रस चूसने वाले कीट सबसे अधिक असर डालते हैं। इन कीटों के हमले से मिर्च के पौधों की वृद्धि रुक जाती है और उत्पादन में भारी गिरावट देखी जाती है। कीटों से बचाव के लिए किसान रासायनिक कीटनाशकों का सहारा लेते हैं, जो फसल को बचाने के साथ-साथ मिट्टी की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे में कृषि विशेषज्ञ किसानों को पारंपरिक देसी जैविक घोल अपनाने की सलाह दे रहे हैं, जो न केवल कीट नियंत्रण में कारगर हैं, बल्कि मिट्टी और फसल दोनों के लिए सुरक्षित भी हैं।
नीम की निंबोली से बना जैविक घोल है असरदार
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, मिर्च की फसल को कीटों से बचाने के लिए नीम की निंबोली से तैयार किया गया जैविक घोल बेहद प्रभावी होता है। यह घोल पत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले और रस चूसने वाले दोनों प्रकार के कीटों पर असर डालता है। सबसे खास बात यह है कि किसान इसे बिना किसी अतिरिक्त खर्च के खुद घर पर ही तैयार कर सकते हैं और हर 15 दिन में इसका छिड़काव कर कीटों की संख्या को नियंत्रित कर सकते हैं।
घोल बनाने की विधि
इस जैविक घोल को तैयार करने के लिए 5 किलो नीम की निंबोली लेकर उसे कूटना या पीसना होगा। फिर 10 लीटर साफ पानी में इसे मिलाकर 20 लीटर की बाल्टी में दो दिन तक ढककर रख दें। दो दिन बाद इस घोल को छान लें। मिर्च की फसल पर छिड़काव के लिए 15 लीटर के पंप में 13.5 लीटर पानी लें और उसमें 1 लीटर तैयार नीम घोल मिलाकर छिड़काव करें। यह प्रक्रिया हर 15 दिन में दोहरानी चाहिए।
कम लागत, ज्यादा फायदा
यह देसी जैविक घोल पूरी तरह से प्राकृतिक और सस्ता उपाय है, जिससे न केवल मिर्च की फसल सुरक्षित रहती है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी लंबे समय तक बनी रहती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसान समय-समय पर इस जैविक घोल का प्रयोग करें, तो रासायनिक कीटनाशकों की जरूरत भी घटेगी और उत्पादन में सुधार भी होगा। अगर आपकी मिर्च की फसल पर कीटों का हमला दिख रहा है, तो यह देसी उपाय आजमाना न भूलें। यह न केवल आपकी फसल को बचाएगा, बल्कि खेती को टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल भी बनाएगा।

