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रासायनिक उर्वरकों पर चेतावनी, प्राकृतिक खेती अपनाने की अपील

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कोच्चि: रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते और अंधाधुंध उपयोग से खेती और पर्यावरण पर पड़ रहे दुष्प्रभाव को लेकर केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान ने व्यापक जागरूकता अभियान चलाया। देशव्यापी ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग और प्राकृतिक खेती अपनाने का संदेश दिया गया। अभियान का उद्देश्य मिट्टी की सेहत को सुरक्षित रखते हुए टिकाऊ कृषि प्रणाली को बढ़ावा देना है।

संतुलित उर्वरक उपयोग पर जोर

जागरूकता कार्यक्रम में 200 से अधिक किसानों ने भाग लिया। वैज्ञानिकों ने बताया कि रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ रहा है और उसकी गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। विशेषज्ञों के अनुसार जरूरत से ज्यादा उर्वरक का उपयोग जल और वायु प्रदूषण बढ़ाने के साथ ही पर्यावरणीय क्षरण को भी तेज करता है।

स्वदेशी तकनीकों का प्रदर्शन

अभियान के दौरान किसानों के सामने कई स्वदेशी तकनीकों का प्रदर्शन किया गया। इनमें समुद्री शैवाल आधारित जैव उर्वरक, मछली अपशिष्ट से तैयार जैविक खाद और जैव संसाधन पुनर्चक्रण मॉडल प्रमुख रहे। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये तकनीकें मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने और प्राकृतिक खेती को मजबूत करने में मददगार साबित हो सकती हैं।

मिट्टी की सेहत का व्यापक असर

विशेषज्ञों ने बताया कि मिट्टी की खराब होती गुणवत्ता का असर केवल फसलों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जल संसाधनों और जलीय जीवों पर भी पड़ता है। पोषक तत्वों के बहाव से जल प्रदूषण बढ़ता है और मत्स्य संसाधनों को नुकसान पहुंचता है।

कई राज्यों में चला अभियान

संस्थान की टीमों ने केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और गुजरात के कई जिलों में किसानों तक पहुंच बनाई। पिछले दो महीनों में 1500 से अधिक किसानों को टिकाऊ खेती, संतुलित उर्वरक उपयोग और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक किया गया।

टिकाऊ खेती की ओर बढ़ता कदम

इस अभियान के जरिए किसानों को यह समझाने की कोशिश की गई कि प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करते हुए खेती करना ही भविष्य की जरूरत है। संतुलित उर्वरक उपयोग और जैविक विकल्प अपनाकर किसान न केवल अपनी लागत कम कर सकते हैं, बल्कि मिट्टी की उर्वरता को भी लंबे समय तक बनाए रख सकते हैं।

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