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भारतीय किसान संघ ने कपास आयात शुल्क छूट बढ़ाने के फैसले का किया विरोध, सरकार से अधिसूचना वापस लेने की मांग

नई दिल्ली: भारतीय किसान संघ (BKS) ने केंद्र सरकार से कपास पर आयात शुल्क (Import Duty) में छूट को 31 दिसंबर तक बढ़ाने के हालिया फैसले को तुरंत वापस लेने की अपील की है। किसान संगठन का कहना है कि इस कदम से घरेलू किसानों को बड़ा आर्थिक नुकसान होगा और भारत आत्मनिर्भरता की बजाय कपास आयात पर निर्भरता की ओर बढ़ सकता है।

आयात पर बढ़ती निर्भरता की चेतावनी

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को लिखे पत्र में बीकेएस ने कहा कि भारत में इस समय कपास का उत्पादन करीब 320 लाख गांठ है, जबकि घरेलू मांग लगभग 391 लाख गांठ तक पहुंच चुकी है। कपास की एक गांठ का वजन औसतन 170 किलोग्राम होता है। मिलों का अनुमान है कि हर साल 60 से 70 लाख गांठ कपास आयात की जाती है, जो कुल उपयोग का लगभग 12 प्रतिशत है। संघ ने चेतावनी दी कि इस साल कपास की खेती का रकबा बीते वर्ष की तुलना में 3.2% कम हुआ है। ऐसे में अगर घरेलू कपास बीज की उपलब्धता नहीं बढ़ाई गई तो भारत, जो कपास का निर्यातक देश रहा है, आने वाले समय में आयातक देश बन सकता है।

कपास किसानों को नुकसान की आशंका

किसान संघ के पत्र के अनुसार, सरकार की घोषणा के बाद से ही कपास की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है। जहां पहले कपास की कीमत 7,000 रुपये प्रति क्विंटल थी, वहीं अब यह घटकर 6,000 रुपये प्रति क्विंटल पर आ गई है। बीकेएस ने सवाल उठाया कि जब आयातित कपास मात्र 2,000 रुपये प्रति क्विंटल में उपलब्ध होगी, तो कोई भी व्यापारी किसानों से 5,000 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर कपास क्यों खरीदेगा?

सरकार से फैसले पर पुनर्विचार की मांग

बीकेएस के महासचिव मोहन मित्रा ने वित्त मंत्री को संबोधित पत्र में कहा कि सरकार को इस फैसले पर गंभीरता से पुनर्विचार करना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर आयात शुल्क छूट की अधिसूचना वापस नहीं ली गई तो भारत आत्मनिर्भरता की राह से भटककर कपास क्षेत्र में विदेशी बाजारों पर आश्रित हो जाएगा। पत्र के अंत में यह भी कहा गया कि किसानों को घरेलू बाजार में बेहतर दाम सुनिश्चित करके ही प्रोत्साहित किया जा सकता है। तभी भारत कपास क्षेत्र में अपनी मजबूती कायम रख पाएगा। बीकेएस ने सरकार से आयात शुल्क छूट की अधिसूचना तुरंत रद्द करने की मांग की है। यह मुद्दा अब कृषि नीति और किसानों की आय पर बड़ा असर डाल सकता है।

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