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बेहतर कल की उम्मीद जगाता एक ‘खास स्कूल’

कैसा महसूस करेंगे हम जब अचानक से हमारे सारे शब्द छीन लिए जाएँ? या फिर शब्द हमारे पास रहें और हम उन्हें बोल न पाएँ? हमें अपनी बातें समझाने में खासी मशक्कत करनी पड़ जाए? हम शब्दों के जरिये अपना प्रेम और अपनी करुणा न दर्शा पाएँ? कल्पना कर ही रूह काँप उठती है। पर उनका क्या जो हर रोज इन परिस्थितियों से दो-चार होते हैं?

चलिए, आज उस दुनिया में चलते हैं। शायद हमें हमारा फ़र्ज़ याद आ जाए…

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