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धान की खेती का बढ़ा रकबा, कीटों से बचाव बनी नई चुनौती

नई दिल्ली: खरीफ सीजन 2025 के दौरान देश में धान की खेती ने एक नया रिकॉर्ड कायम किया है। कृषि मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, इस बार धान की बुवाई का रकबा 245.1 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष के 216.2 लाख हेक्टेयर की तुलना में करीब 13.4 प्रतिशत अधिक है। यह वृद्धि जहां देश की खाद्य सुरक्षा और किसानों की मेहनत का संकेत है, वहीं इसके साथ ही एक बड़ी चुनौती भी सामने आई है, वो है – फसल को कीटों से बचाने की। धान की फसल को उसकी शुरुआती अवस्था में ही कई तरह के कीटों का खतरा रहता है, जो अगर समय पर नियंत्रित न किए जाएं तो पूरी फसल को बर्बाद कर सकते हैं। इस समय सबसे अधिक खतरा तना छेदक, फुदका और पत्ती लपेटक जैसे कीटों से है, जो फसल की वृद्धि को रोकने के साथ-साथ उसकी उपज को भी भारी नुकसान पहुंचाते हैं।

फुदका कीट, विशेष रूप से भूरा फुदका, धान की फसल के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है। यह कीट पौधे के निचले हिस्से से रस चूसता है और उसका पूरा जीवन-चक्र वहीं पूरा करता है। इसके प्रकोप से पौधे सूखने लगते हैं और खेतों में ‘हॉपर बर्न’ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। वहीं हरा फुदका पत्तियों का रस चूसकर उन्हें पीला कर देता है, जिससे पौधे की वृद्धि रुक जाती है। इन कीटों से बचाव के लिए किसानों को खेतों की नियमित निगरानी करनी चाहिए और यदि इनका हमला दिखाई दे तो इमिडाक्लोप्रिड 17.8% SL जैसे कीटनाशकों का इस्तेमाल करना चाहिए, जिसे 1 मिलीलीटर प्रति 3 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव किया जाता है।

इसके अलावा पत्ती लपेटक कीट फसल को भीतर से खोखला कर देता है। इसकी सुंडी पत्तियों को रेशम जैसी सिलाई कर लपेट देती है और अंदर छिपकर उनका हरा पदार्थ खा जाती है। इससे पत्तियां जालीदार और सफेद हो जाती हैं, और अंततः सूखने लगती हैं। इस कीट को नियंत्रित करने के लिए रस्सी तकनीक काफी कारगर मानी जाती है, जिसमें खेत के दोनों ओर से एक लंबी रस्सी लेकर पौधों के ऊपर घुमाया जाता है ताकि कीट बाहर निकलकर पानी में गिर जाएं। यदि कीटों की संख्या अधिक हो तो डाइमेथोएट 30% EC का छिड़काव किया जाना चाहिए।

धान की फसल के लिए तना छेदक भी एक गंभीर खतरा है, जो किसी भी अवस्था में फसल को नुकसान पहुंचा सकता है। इसकी सुंडी पौधे के तने के भीतर घुसकर गाभे को खा जाती है, जिससे पौधा सूख जाता है। जब यह प्रकोप बालियों की अवस्था में होता है, तो बालियां सफेद हो जाती हैं और उनमें दाने नहीं भरते। इससे फसल की उत्पादकता सीधी तौर पर प्रभावित होती है। रोकथाम के लिए पत्तियों के ऊपरी हिस्सों को काटना और खेत में पानी की उचित गहराई बनाए रखते हुए कार्बोफ्यूरॉन या कारटाप हाइड्रोक्लोराइड जैसे कीटनाशकों का छिड़काव करना उपयोगी होता है। रकबे में बढ़ोतरी निश्चित रूप से एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन इसके साथ ही फसल की रक्षा को लेकर सजगता भी उतनी ही जरूरी हो जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) तकनीकों को अपनाकर और समय रहते कीटों की पहचान कर किसान अपनी मेहनत को बचा सकते हैं और अच्छी उपज सुनिश्चित कर सकते हैं। सरकार की ओर से भी किसानों को जागरूक और प्रशिक्षित करने के प्रयास किए जा रहे हैं, ताकि बढ़ी हुई फसल का लाभ पूरी तरह मिल सके।

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