नई दिल्ली: एआई आधारित बासमती धान सर्वे परियोजना (2026-2028) की घोषणा के बाद कृषि और निर्यात क्षेत्र में बहस तेज हो गई है। केंद्र की इस योजना में करीब 40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है, जबकि पहले के आंकड़ों के अनुसार बासमती खेती का दायरा इससे काफी कम बताया गया था। यही अंतर अब विवाद का मुख्य कारण बन गया है और इसे जीआई क्षेत्र के संभावित विस्तार से जोड़कर देखा जा रहा है।
परियोजना का उद्देश्य और दायरा
सरकार के अनुसार इस सर्वे में करीब 40 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया जाएगा। इसके तहत डेढ़ लाख से अधिक जमीनी आंकड़े जुटाए जाएंगे और पांच लाख से ज्यादा किसानों को जोड़ा जाएगा। योजना का उद्देश्य उत्पादन का सटीक आकलन, बासमती किस्मों की पहचान, वैज्ञानिक सलाह और निर्यात की बेहतर रणनीति तैयार करना है।
फंडिंग और हितों के टकराव पर सवाल
इस परियोजना की फंडिंग निर्यात से जुड़े कोष से की जाएगी, जिसमें निर्यातकों से प्रति टन शुल्क लेकर धन एकत्र किया जाता है। उद्योग से जुड़े कुछ सूत्रों ने आशंका जताई है कि इस प्रक्रिया में हितों के टकराव की स्थिति बन सकती है, क्योंकि कुछ संगठनों की भागीदारी और उनके प्रतिनिधियों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।
पुराने सर्वे बंद होने से बढ़ी चिंता
उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि पहले हर साल बासमती का सर्वे किया जाता था, लेकिन 2024 से इसे बंद कर दिया गया। यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि कुछ निर्यातकों के दबाव के कारण यह निर्णय लिया गया। साथ ही गैर-जीआई क्षेत्रों को शामिल करने के सुझाव को भी खारिज कर दिया गया, जिससे विवाद और गहरा गया है।
उद्योग संगठनों की प्रतिक्रिया
चावल निर्यात से जुड़े संगठनों ने इस परियोजना में शामिल होने की इच्छा जताई है और कहा है कि व्यवस्थित सर्वे से ही सही आंकड़े मिल सकते हैं। उनका सुझाव है कि जीआई और गैर-जीआई क्षेत्रों के लिए अलग-अलग रिपोर्ट तैयार की जानी चाहिए, ताकि नीति निर्माण में स्पष्टता बनी रहे।
जीआई दायरे पर कानूनी विवाद
बासमती का जीआई दायरा वर्तमान में उत्तर भारत के कई राज्यों तक सीमित है। मध्य प्रदेश को इस दायरे में शामिल करने को लेकर मामला अदालत में लंबित है। पहले इस मांग को खारिज किया जा चुका है, लेकिन उच्च स्तर पर सुनवाई जारी है। यही कारण है कि नए सर्वे के दायरे को लेकर कानूनी और नीतिगत बहस तेज हो गई है।
आगे क्या होगा
विशेषज्ञों का मानना है कि इस सर्वे के निष्कर्ष भविष्य की नीति और निर्यात रणनीति को प्रभावित कर सकते हैं। यदि दायरे में बदलाव होता है, तो इसका असर बासमती के बाजार और किसानों दोनों पर पड़ेगा। फिलहाल यह मुद्दा नीति, कानून और उद्योग के बीच संतुलन बनाने की चुनौती बन गया है।
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