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आलू की खेती : घाटे की जंग में लागत निकलना भी मुश्किल

(नई दिल्ली) मुनाफे की आस में आलू की खेती करने वाले किसानों की हालत फिलहाल परेशान करने वाली है. लाभ कमाने की आस ने तो कब का साथ छोड़ दिया है. आलाम ये है कि घाटे की जंग में लागत निकल जाए तो भी बहुत है. मंडियों और बाजारों में आलू कौड़ियों के भाव में बिक रहा है. आलू उत्पादक राज्यों में भाव गिर कर 2 से 5 रुपये किलो पर पहुँच गया है.

दिल्ली की आजादपुर मंडी में साल के पहले दिन आलू का भाव गिरावट के बाद 360 से 800 रुपये प्रति क्विंटल के बीच रहा. मेहनत-मजदूरी और तमाम खर्चों को निकालने के बाद किसानों को महज 150 से 450 रुपये प्रति क्विंटल का ही भाव मिल पा रहा है. ऐसे में कई किसान तो आलू की निकासी से भी परहेज करने लगे हैं. आजादपुर मंडी के पोटेटो ऐंड अनियन मर्चेंट एसोसिएशन के महासचिव राजेंद्र शर्मा ने इस बाबत बताया कि, “पंजाब और हिमाचल के बाद उत्तर प्रदेश से भी नए आलू की आवक शुरू हो गई है. आवक के मुकाबले मांग कम होने से भाव में मंदी आई है. आजादपुर मंडी में 18 से 19 हजार क्विंटल आलू की आवक हो रही है और नए आलू के भाव घटकर 360 से 800 रुपये प्रति क्विंटल रह गए जबकि पुराना आलू 150 से 400 रुपये क्विंटल बिक रहा है.”

अब अगर आँकड़ों और अनुमानों की बात करें तो, राष्ट्रीय बागवानी एवं अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान के अनुसार वित्त वर्ष 2017-18 के पहले 11 महीनों अप्रैल से फरवरी के दौरान 3,07,409 टन आलू का निर्यात हुआ है जबकि वित्त वर्ष 2016-17 में कुल निर्यात 2,55,725 टन का ही हुआ था.

कृषि मंत्रालय के पहले आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2017-18 में आलू का उत्पादन बढ़कर 493,44,000 टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल इसका उत्पादन 486,05,000 टन का ही हुआ था.

अब अगर बात की जाए समस्या के समाधान की तो एक बात साफ तौर पर कही जा सकती है कि, किसान फसल के विभिन्न आंकड़ों और अनुमानों को ध्यान में रख कर यदि खेती करें तो काफी हद तक भावी नुकसान से बच सकते हैं. मसलन पिछले साल किस फसल की कितनी पैदावार रही या फिर मौसम और जलवायु के लिहाज से आगे किस फसल या सब्जी की खेती लाभकारी हो सकती है.

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