नई दिल्ली: भारत दुनिया के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक देशों में शामिल है और देश के कुल दूध उत्पादन में गायों का महत्वपूर्ण योगदान है। देसी नस्ल की कई गायों का दूध और उससे बनने वाला घी अपनी गुणवत्ता के कारण बाजार में ऊंचे दाम पर बिकता है। हालांकि, बरसात का मौसम गायों के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण माना जाता है। इस दौरान नमी, गंदगी और संक्रमण बढ़ने से कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। यदि समय रहते सावधानी बरती जाए और नियमित टीकाकरण कराया जाए, तो इन बीमारियों से बचाव संभव है।
बरसात में गायों को घेरती हैं ये प्रमुख बीमारियां
- बरसात के मौसम में गलघोंटू रोग सबसे खतरनाक बीमारियों में माना जाता है। इस रोग में गाय को तेज बुखार, सांस लेने में परेशानी और गले में सूजन की समस्या होती है। समय पर उपचार के साथ बरसात से पहले टीकाकरण कराना सबसे प्रभावी बचाव माना जाता है।
- थनैला रोग भी इस मौसम में तेजी से फैलता है। इसमें थनों में सूजन आ जाती है और दूध में गांठें या छर्रे दिखाई देने लगते हैं। ऐसे में पशु के थनों की नियमित सफाई और समय-समय पर जांच कराना जरूरी होता है।
- लंगड़ा बुखार होने पर पशु को तेज बुखार आता है, पैरों में सूजन हो जाती है और वह लंगड़ाकर चलने लगता है। इस बीमारी से बचने के लिए समय पर टीकाकरण और बीमार पशु को स्वस्थ पशुओं से अलग रखना चाहिए।
- प्रसव के बाद कई गायों में मिल्क फीवर की समस्या भी देखने को मिलती है। इसमें शरीर का तापमान कम हो जाता है और सांस लेने में कठिनाई होती है। पशु को कैल्शियमयुक्त आहार देने और प्रसव के बाद कुछ दिनों तक पूरा दूध नहीं निकालने की सलाह दी जाती है।
खुरपका-मुंहपका और एंथ्रेक्स से रहें सतर्क
खुरपका-मुंहपका रोग में गाय के मुंह और खुरों में छाले बन जाते हैं, जिससे पशु को खाने-पीने में परेशानी होती है और दूध उत्पादन भी घट जाता है। इस बीमारी से बचाव के लिए नियमित टीकाकरण और बरसात के दौरान खुले स्थानों पर चराने से बचना चाहिए। एंथ्रेक्स रोग में तेज बुखार के साथ पेशाब और गोबर में खून आने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। ऐसे लक्षण दिखते ही तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए और समय पर टीकाकरण कराना चाहिए।
यक्ष्मा और संक्रामक गर्भपात भी बन सकते हैं खतरा
यक्ष्मा होने पर गाय सुस्त हो जाती है, लगातार सूखी खांसी आती है और कई बार नाक से खून भी निकल सकता है। ऐसे पशु का तुरंत उपचार कराना आवश्यक होता है। संक्रामक गर्भपात की स्थिति में गर्भधारण के पांच से छह महीने बाद गर्भपात हो सकता है। इससे बचाव के लिए पशुशाला की साफ-सफाई, नियमित कृमिनाशक दवा और समय पर टीकाकरण बेहद जरूरी माना जाता है।
अफारा की समस्या को न करें नजरअंदाज
बरसात के दौरान हरा चारा अधिक खाने से कई बार गायों में अफारा की समस्या हो जाती है। इसमें पशु का बायां पेट फूल जाता है और थपथपाने पर ढोल जैसी आवाज सुनाई देती है। ऐसी स्थिति में घरेलू उपचार करने के बजाय तुरंत पशु चिकित्सक की सलाह लेना चाहिए।
समय पर देखभाल से बचाया जा सकता है बड़ा नुकसान
विशेषज्ञों के अनुसार बरसात के मौसम में पशुशाला की नियमित सफाई, सूखा और साफ बिछावन, संतुलित आहार, स्वच्छ पेयजल, समय पर टीकाकरण और पशुओं की नियमित स्वास्थ्य जांच से अधिकांश बीमारियों से बचाव किया जा सकता है। समय रहते सावधानी अपनाकर पशुपालक इलाज का खर्च कम करने के साथ-साथ दूध उत्पादन में होने वाले नुकसान से भी बच सकते हैं।
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