गाजियाबाद: जुलाई से सितंबर के बीच होने वाली बारिश और बढ़ी हुई उमस का असर केवल फसलों पर ही नहीं, बल्कि पशुओं के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। इस मौसम में तापमान और नमी में लगातार बदलाव के कारण पशुओं की पाचन क्षमता और रोग प्रतिरोधक शक्ति कमजोर हो जाती है। ऐसे में दुधारू और काम करने वाले पशु संक्रामक बीमारियों की चपेट में जल्दी आ जाते हैं, जिससे पशुपालकों और डेयरी किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। पशु चिकित्सकों का कहना है कि समय पर टीकाकरण, साफ-सफाई और संतुलित आहार से अधिकांश बीमारियों से बचाव संभव है।
गलघोंटू बीमारी से बचाव के लिए समय पर कराएं टीकाकरण
उपमुख्य पशुचिकित्सा अधिकारी, गाजियाबाद डॉ. हरिबंश सिंह के अनुसार बरसात के मौसम में पशुओं में गलघोंटू बीमारी का खतरा सबसे अधिक रहता है। यह एक गंभीर संक्रामक रोग है, जिसमें समय पर उपचार नहीं मिलने पर बड़ी संख्या में पशुओं की मृत्यु हो सकती है। उन्होंने बताया कि इस बीमारी में पशु को तेज बुखार आता है, शरीर कांपने लगता है, वह खाना-पीना छोड़ देता है तथा मुंह और नाक से स्राव निकलने लगता है। इसके साथ ही गले से तेज आवाज आने लगती है और अंत में सांस लेने में कठिनाई होने से पशु की मृत्यु तक हो सकती है। डॉ. सिंह ने पशुपालकों को सलाह दी कि बारिश शुरू होने से पहले या फिर निर्धारित टीकाकरण अवधि में सरकारी पशु चिकित्सालय से निःशुल्क टीका अवश्य लगवाएं। यदि किसी कारण से टीकाकरण नहीं हो पाया है तो तुरंत नजदीकी सरकारी पशु चिकित्सालय में संपर्क करें।
खुरपका-मुंहपका और सर्रा रोग से भी रखें सावधानी
बरसात के दौरान खुरपका-मुंहपका तथा सर्रा रोग का खतरा भी बढ़ जाता है। खुरपका-मुंहपका रोग में पशुओं के खुर और मुंह में घाव हो जाते हैं, जिससे वे चारा नहीं खा पाते और दूध उत्पादन में भारी कमी आ जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार समय पर टीकाकरण कराना और पशुओं के खुरों की नियमित सफाई करना इस रोग से बचाव के लिए आवश्यक है।
वहीं सर्रा रोग मक्खियों के माध्यम से फैलता है। यह रोग पशुओं के रक्त को प्रभावित करता है और गंभीर स्थिति में उनकी दृष्टि तथा सामान्य गतिविधियों पर भी असर डाल सकता है। इससे बचाव के लिए पशुशाला की नियमित सफाई, जलभराव से बचाव तथा कीट नियंत्रण के उपाय अपनाना जरूरी है।
किलनी, जूं और पेट के कीड़ों पर रखें नियंत्रण
डॉ. हरिबंश सिंह ने बताया कि बरसात के मौसम में किलनी, चिचड़े और जूं जैसे बाहरी परजीवी तेजी से बढ़ते हैं। ये पशुओं का रक्त चूसकर उन्हें कमजोर बना देते हैं और कई अन्य रोगों का कारण भी बनते हैं। उन्होंने सलाह दी कि पशुओं तथा उनके रहने के स्थान की नियमित सफाई की जाए। यदि किलनी दिखाई दे तो पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार दवा का प्रयोग करें और दवा लगाने के कम से कम चौबीस घंटे बाद ही पशु को नहलाएं।
उन्होंने यह भी बताया कि पेट के कीड़े छोटे बछड़ों और बड़े पशुओं दोनों के लिए नुकसानदायक होते हैं। छोटे बछड़ों में इनसे मृत्यु का खतरा बढ़ सकता है, जबकि बड़े पशुओं में दूध उत्पादन कम हो जाता है। पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार नवजात बछड़ों को जन्म के पंद्रह दिनों के भीतर तथा बड़े पशुओं को प्रत्येक चार महीने पर पेट के कीड़ों की दवा देना लाभकारी माना जाता है।
साफ-सफाई और संतुलित आहार से रहेगा पशु स्वस्थ
विशेषज्ञों का कहना है कि बरसात के मौसम में पशुओं को स्वच्छ और सूखे स्थान पर रखना चाहिए। पशुशाला में जलभराव नहीं होने देना चाहिए तथा साफ पेयजल और संतुलित आहार की व्यवस्था करनी चाहिए। समय पर टीकाकरण, नियमित स्वास्थ्य जांच, संतुलित पोषण और पशु चिकित्सक की सलाह का पालन करके पशुपालक बरसात के मौसम में अपने पशुओं को गंभीर बीमारियों से सुरक्षित रख सकते हैं। इससे दूध उत्पादन में गिरावट को रोका जा सकता है और डेयरी व्यवसाय को होने वाले आर्थिक नुकसान से भी काफी हद तक बचा जा सकता है।
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